ज्ञान महाकुंभ २०२५
श्रीमद्भगवद् गीता के अध्याय चार, श्लोक संख्या 38 में कहा गया है न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते' अर्थात् इस दुनिया में जान नीति के समान पवित्र और कुछ नहीं है।
भारतीय परंपरा में शिक्षा (विद्या) जान प्राप्ति का महत्वपूर्ण माध्यम था। पिछले लगभग 175 वर्षों की मैकॉले की शिक्षा नीति के प्रभाव के कारण शिक्षा मात्र नोकरी प्राप्त करने का माध्यम बन गई। विगत कुछ दशकों से अधिकतर शैक्षिक विमर्श मात्र समस्याओं की चर्चा तक सीमित हो गए।
उपर्युक्त शैक्षिक परिदृश्य में सुधार एवं परिवर्तन हेतु शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास ने वर्ष 2004 में शिक्षा बचाओ आन्दोलन के माध्यम से शैक्षिक पाठ्यक्रमों में व्याप्त विसंगतियों व विकृतियों को दूर करने के लिए सफल आन्दोलन चलाया। परिणामस्वरूप स्वतंत्र भारत में शैक्षिक पाठ्यक्रम, संचार माध्यमों एवं समाज में भी चर्चा का विषय बना।
वर्ष 2007 में शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास का गठन किया गया। न्यास ने शिक्षा में नए विकल्प को अपना लक्ष्य बनाया। इस हेतु न्यास ने "चरित्र निर्माण एवं व्यक्तित्व का समग्र विकास, पर्यावरण, वैदिक गणित आदि विषयों पर विमर्श खड़े करने के साथ-साथ कुछ नए पाठ्यक्रम भी तैयार किए। वर्ष 2014 में 'शिक्षा में नए विकल्प' का प्रारूप तैयार किया गया और बाद में एक छोटी पुस्तिका प्रकाशित करके देश में इस पर विमर्श खड़ा किया गया। इसमें से अनेक बातों का शिक्षा नीति में समावेश भी किया गया। वर्ष 2015 से राष्ट्रीय शिक्षा नीति पर देश व्यापी कार्य प्रारंभ किया एवं 2020 में शिक्षा नीति घोषित होने के बाद उसके क्रियान्वयन पर न्यास सातत्यपूर्ण ढंग से कार्य कर रहा है।
वर्ष 2018 में शिक्षा के क्षेत्र में सकारात्मक कार्य, नवाचार एवं भारतीयता की दिशा में कार्य करने वाली संस्थाओं एवं विद्वानों को एक मंच पर लाकर उनके कार्यों का प्रस्तुतीकरण एवं प्रदर्शनी हेतु 'ज्ञानोत्सव' का आयोजन प्रारम्भ किया। इसके पश्चात 2019 एवं 2022 में भी राष्ट्रीय एवं राज्यों के स्तर पर 'ज्ञानोत्सव के आयोजन किए गए। भारत में शिक्षा को जान प्राप्ति का माध्यम माना गया है, और ज्ञान प्राप्ति आनंददायक प्रक्रिया होती है। साथ ही, शिक्षा जगत में सकारात्मक कार्य करने वाले विद्वान, आचार्य एवं छात्र एक मंच पर आकर कार्य कर सकते हैं, 'ज्ञानोत्सव' इसका उदाहरण बना।
इस वर्ष ज्ञानोत्सव के अगले चरण में 'ज्ञानकुंभ' एवं 'ज्ञान महाकुंभ' के आयोजन की योजना है। आज देश में शिक्षा में बढ़ते व्यापारीकरण के कारण शिक्षा व्यवसाय बन गया है। भारतीय परम्परा में शिक्षा को सेवा का माध्यम (चेरिटी) माना गया है। साथ ही शिक्षा समाज व सरकार की प्राथमिकता का विषय भी बने, यह प्रक्रिया देशभर में आगे बढ़े, इस दिशा में प्रयास हेतु ज्ञानकुंभ व महाकुंभ का आयोजन किया जा रहा है। कुंभ मेले में जाने वाला प्रत्येक व्यक्ति बिना किसी अपेक्षा एवं मन में भक्तिभाव धारण करके स्वयं या परिवार के साथ सहभागी होता है। ज्ञान कुंभ एवं 'महाकुंभ' में भी शिक्षाविद्, आचार्य, छात्र आदि इसी भाव से सहभागी हों, इस प्रकार का भाव जागरण करना इस ज्ञानकुंभ का प्रमुख उद्देश्य है।
देश की चारों दिशाओं में विभिन्न शेक्षिक संस्थाओं के साथ मिलकर चार ज्ञानकुंभ एवं प्रयागराज के कुंभ मेले में 'ज्ञान महाकुंभ' आयोजित किया जा रहा है।